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यूँ ही राष्ट्र कवि नहीं कहा गया मैथिलीशरण गुप्त जी को

"पर्वतों की ढलान पर हल्का हरा और गहरा हरा रंग एक−दूसरे से मिले बिना फैले पड़े हैं....।" कैसा सही वर्...

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